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आंसू वे जो थम ना पाए और बहती आंखें

दिल ही तो है यारो | क्या है प्यार

आंसू  वे जो थम ना पाए…

ये सिसकियां और चीखने की आवाज़ें शायद उन कानों तक पहुंची ही नहीं
क्योंकि उन कानों में सिर्फ अपने फायदों के बातें ही सुनाई दी
ये खून से लथपथ शहीद तिरंगे में लिपटे उन्हें दिखाई नहीं दिए
क्योंकि आंखों पर उनके हकूमती रियासतों के काले चश्मे जो चढ़े हुऐ
कुछ ऐसे भी थे जो कह उठे कि ऐसी नौकरी करना इन जवानों के अपने निजी निर्णय थे
क्या वो हैं जानते कि इनके निजी निर्णयों की वजह से ही तो चैन से वे लोग अपने घरों में सोते
एक आतंकवादी गोली चला इन जवानों को शहीद कर जाता
पर इनकी शहादत पर भी दो आंसू बहाने की बजाए सत्ता का खेल खेलने वाला फिर भी बाज नहीं आता
आखिर उसका क्या बिगङा होता?
कुछ भी तो नहीं, पर उस शहीद का  तो पूरा  परिवार बिखर जाता
घर संसार तितर बितर हो जाता
बूढे माता पिता के बुढापे का सहारा छूट जाता
जवान पत्नी की मांग का सिन्दूर मिट जाता
फिर वो क्या कर जाए ,किस से फरियाद कर आए?
कौन जाने आगे जीना उसका कैसे हो पाए?
मासूम नादान बच्चों को क्या समझाए?
आंसू ये जो उसकी आंखों से थामें तो थम ना पाऐं …

द्वारा अनु सैनी

बहती आंखें…

कल आंखो में कटी मेरी पूरी रैन क्योंकि रिमझिम से बरस रहे थे मेरे नैन
याद कर वो बीते जवानी के दिन और अलहङ से बचपन को
डैडी से अपनी हर ज़िद्द मनवा उनकी गोद में जीए उस लाङ भरे छुटपन को
मां के प्यार से लेकर उनके मार में भी वात्सल्य से छिपे हर स्पर्श को
भाई के संग जबरदस्ती सिनेमा देखने में उस हर्ष को
छोटी बहन के साथ हर चीज़ के लिए की गई हाथापाई को
मिलकर खाते पर”पहले मैं लूंगी” की लङाई को
बङी बहन की स्नेह से भरी हमारी देखभाल वो
मेरा गुस्सा जब कटवाने ले जाती मेरे बाल वो
मेरा स्कूल में सखियों के संग खूब हंसना
शरारत भरी बातें कर जाना
वो छुट्टियों में नाना नानी और दादा दादी के घर जा उछलकूद करना
खूब शोर मचाना
कालेज में पहुंचे तो दोस्तो संग उठना बैठना कैन्टिन में गरम गरम वो ब्रैड पकोङे समोसे ऐंठना
फिर शादी हो गई तो अपनी नई गृहस्थी को संभालने की जटिल पहेली बूझना
बच्चे हो गए तो उनके सही पालन पोषण से जूझना
बात ना मानने पर मेरा उन पर गुस्से से चीखना चिल्लाना
पर जब खेलते खेलते थक जाते तो प्यार से मेरी गोद में उनका बैठना गाल पर मेरी मीठी से चुम्बन दे जाना
घण्टों बातें अपनी सुनाना
और मेरा काम करते करते थक जाना ऐसे ही साल कितने कितनी जल्दी बीत गए
और एक दिन बच्चे बङे हो अपनी पढाई काम धन्धे के लिए कहीं और बस गए
अब घर मैं और मेरे पति हैं रह गए
दोनो अपने कामों में जुटे हुए
बस अब तो उन दिनों की सिर्फ सुनहरी यादें हैं रह गई
जिन्हें जी भरकर मैं थी जी गई
अब जिस दिन तनहाइयाँ मुझे सताऐं
और वो गुज़रे दिन खूब याद आऐं
तब अपने पर काबू ना हो पाए
फिर उस दिन अखियों से सिर्फ नदियां ही बहती जाऐं

द्वारा अनु सैनी

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