कौन है सगा | जब आशिक पति बन जाए

कौन है सगा…

थक जाता है जब इन्सान सब को खुश करते करते
पर फिर भी बहुत से ऐसे जो कभी खुश नही होते
बल्कि उसकी उम्र भर की सेवा को है नकार जाते
इक पल में उसको दुत्कार जाते
तब दुख अन्तर्मन के लगते हैं उसको कटोचने
मजबूरन वो बैठ जाता है सोचने
कि क्यों मैने पूरी ज़िन्दगी इन सगों पर गँवा दी?
क्यों अपनी कभी परवाह नहीं की?
इतना सब करने पर मुझे क्या मिला सिला?
कौन सा फतह कर लिया मैने किला?
यदि समय रहते कुछ अपनी जिन्दगी के साथ किया होता
अपने मन का जीया होता
अपनी प्रतिभा को पहचाना होता
उसे निखारा होता
तब उसको पूरा करना ज़िन्दगी का हसीन ख्वाब होता
तो आज मेरा भी कोई रूतबा रूबाब होता
पर अफसोस ये जिन्दगी दे गई दगा
अब कोई नही लगता है मुझको सगा…

द्वारा अनु सैनी

जब आशिक पति बन जाए…

आशिक बहुत तरह के होते हैं
जैसे कि आम तौर से देखे जाते हैं कुछ शौकीन
तो कुछ रंगीन
कुछ अपने पैसों से रिझाने वाले
तो कुछ फुकरे पर दिल वाले
कुछ अधिकारबोधक इर्ष्यालु
कुछ बात मानने वाले दयालु
कुछ हठीले
कुछ शर्मीले
कुछ हाजिरजवाब परिहासयुक्त
कुछ निःशब्द ऐसे मानो रखे हो मौनव्रत
कुछ चतुर तेज़ तरार
कुछ सीधे शरीफ जैसी मुथरी कटार
कुछ सोच समझ कर बोलने वाला
कुछ मुंहफट जिस के मुख पर कोई ना लगा सके ताला
कुछ शांतचित्त
तो कोई चंचल उत्तेजित
कुछ प्रदर्शनात्मक
तो कुछ सकारात्मक
कोई होते आशावादी
तो कुछ की सोच निराशवादी
चाहे जैसा भी हो आशिक
पर जब एक लङकी के प्यार में पङ जाए तो हर कोई हो जाता है शहीद
फिर लङकी पटाने के लिए अपने ढंग से नुस्खे सौ अपनाता
लङकी पर आज़माता
बल्ले बल्ले हो जाए अगर लङकी जल्दी पट जाए
और ना पटे तो या तो वो पीछे हट जाए
वरना हुक्का पानी ले कर डट जाए
और हर हाल में लङकी को मनाए
पर फिर जब शादी हो जाए
और आशिक पति बन जाए
तो सब भिन्न प्रकार के आशिक कुछ सालों बाद एक ही समान के पति नज़र आते
तब सब सारी आशिकी भूल जाते
घर गृहस्थ की ड्यूटी संभालते
अपनी बीवी को घर की मुर्गी दाल बराबर समझते
और दूसरे की बीवी को देख मन ही मन सोचते
“काश !मेरी पत्नी भी इनकी बीवी के जैसे गुणवती सुशील बिन सींग वाली गाय समान होती
तो ज़िन्दगी मेरी भी सकूर्ण भरी महान होती
पर मेरी वाली तो बोल बोल कर पीछे पङ कर दिमाग है चाट जाती
मुझे आदमी कम गधा ज्यादा समझती
पर हम भी कौन सुनने वाले हैं
हम भी तो कानों में रूई डाले हैं
अगर पत्नी है सेर तो हम पति सवा सेर
पत्नी के सामने हामी में मुण्डी हिलाते
और उसके ओझल होते ही सब हिदायतें भूल अपनी मर्ज़ी चलाते

द्वारा अनु सैनी


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