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पान्डुजी प्यार में पड़ गए – Pandu Ji series (2)

पान्डुजी प्यार में पड़ गए

पान्डुजी को हो गया प्यार
चढ गया उन पर आशिकी का बुखार
गए थे बाज़ार सब्ज़ी खरीदने
साथ में मालिक की पुरानी पीतल की परात बेचने
अभी दुकान पर पहुँचे ही थे वो
साइकिल से नीचे उतर रहे थे पाँव दो
कि इक गोरी महिला से टकरा गए
और टकराते ही उन्हें लगा कि दो जिस्म इक जान हो गए
जो अब तक अन्जान थे इक पल में उनके हो गए
वो महिला थी मोटी नाटी सी
उम्र शायद तीस या पैंतिस की
पर पान्डुजी को तो वो लगी कमसिन हसीना सी
गद्देदार शोख नगीना सी

पहने थी लाल रँग का सलवार कमीज़ का टाइट सूट
पान्डुजी का तो दिल ले गई इक पल में वो लूट
उस पल नैनों के बाण पान्डुजी पर ऐसे चल गए
कि प्यार के नशे में वो तो रम गए
सब सब्ज़ी परात बेचना भूल गए
बस महिलाजी को घूरना शुरू हो गए
उस महिला ने जब उनको घूरते हुए देखा ऐसे
लगे पान्डुजी उसको इक आवारा वहशी बन्दे जैसे
पहले दुकानदार से कर रही थी जो मोल भाव
फिर उसने ना देखा कोई आव ताव
बस खींच के जड़ दिए दो थप्पड़ पान्डुजी की गाल पर
गालियाँ दी जम कर ना तरस आया पन्डुजी के हाल पर
चिल्लाकर बोली”आ जाते हैं पता नहीं कहाँ से

कोई औरत देखी नहीं कि छूना चाहते उसे हर जगह से

आशिक बना फिर रहा यहाँ
घर में माँ बहन नहीं है क्या
उनसा क्या कुछ नहीं सीखा
और आगे से कहीं मेरे आस पास भी दिखा
तो बच्चू, तेरी खैर नहीं
पँजाबी कुड़ी हूँ मैं, टाँगे तुड़वा दूँगी वही

चल हट परे हो
वरना और दूँगी दो”
कह कर वो तो चली गई
पर पान्डुजी की हालत खराब कर गई
गाल पर चाहे थप्पड़ थे गड़ गए
पर वो तो सच्चे प्यार में थे पड़ गए
दुखी मन से घर आ गए

और अब टूटे दर्दे दिल के गाने ही उनको भा गए
रातें भी जाग जाग कर वो काटते
कोई काम में मन ना लगाते
अब उस को रोज़ ढूँढने है जाते

पर वो फिर नही मिली बस अब सारा दिन ये गाते फिरते
“इक कुड़ी जिदा नाम मौहब्बत गुम है
गुम है, गुम है…”

सो भईया, कोई तो पन्डुजी पर तरस खाओ
उनकी महबूबा को ढूँढ के लाओ
आखिर प्यार में पड़ गए हैं वो
नए नए आशिक पान्डुजी बने हैं जो….

द्वारा अनु सैनी

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