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पान्डुजी गए पहली लड़की देखने – Pandu ji series (9)

पान्डुजी गए पहली लड़की देखने

पाया था पान्डुजी ने चाहे अम्माजी का हिदायतों भरा सँदेश
पर देख कर लगा नहीं, इस बात का उन पर कुछ असर हुआ विशेष
क्योंकि पान्डुजी तो लड़की देख उसे पसन्द करने के लिए हो गए थे बेकरार
इसलिए अगले ही दिन गाँव को किया प्रस्थान ,हो कर जोरों शोरों से तैयार
सिर पर चमेली का तेल लगा छटँकी भर बालों को था बनाया
कान के पीछे थोड़ा सस्ता सा इतर भी खरीद छिड़काया
पीला रेशमी कढाई वाला कुरता उनका था नया
पर दर्जी ने नीला चूड़ीदार पायजामा तँग था सिया
जो मुश्किल से सिरक सिरक कर ऊपर था चढा
चढाते चढाते पान्डुजी बेचारा तो हो गया था अधमरा
पर चूँकि ,लड़की देखने से पहले वो मूड अपना खराब करना नहीं था चाहता
इसलिए दर्जी को चाह कर भी गाली ना दे सका
आँखों पर पच्चीस रूपये वाला था रँगीन चश्मा लगाया
पैरों में लाल सैन्डल चढाया
कलाई में हरा रूमाल बाँध लिया
कन्धे पर गुलाबी झोला टाँग लिया
मुँह में बनारसी सादा पान था डाल लिया
रसे ने जिसके होंठों को उनके लाल किया
पान्डुजी तो सिर से पैर तक होली में रँगा रँगीला भैय्या नज़र आए
पर वो तो अपने को किसी फिल्मी हीरो से कम ना समझ पाए
आज पान्डु भैय्या की चाल ढाल में नया जोश नया रँग था
बीस इन्च का सीना फुला हाथों को फैला चलने का नया ही ढँग था
अम्मा की तबीयत हो गई अचानक खराब
इसलिए अकेले ही चल दिए लड़की देखने पान्डुजी बन कर नवाब
पहले वो शँभु चाचा की लड़की देखने को गए
पर दो घण्टे तक इन्तज़ार करते रहे
पर लड़की ने दर्शन नही दिए
बेचारे पान्डुजी बार बार यूँही इधर उधर गर्दन उचकते रहे
शायद लड़की के थोड़े दीदार हो जाऐं
साथ में शँभु चाचा ने कुछ खाने पीने को भी कुछ था ना दिया
सिर्फ इक ठन्डे पानी का गिलास था थमा दिया
अब कितना पानी पान्डुजी थे पी सकते
कहीं सुसु ना आ जाए इस बात से भी थे डरते
और कितना शँभु चाचा और वे एक दूसरे को घूर सकते
कितना इधर उधर पान्डुजी तकते
आखिर हार कर पान्डुजी ने पूछ ही लिया
जब आखिर उनसे रहा नहीं गया,
“का शम्भु चाचा ,लड़की कब दिखाए रहो
इन्तजार करत करत हमार तो कमर ही टूट गयो
अम्मा होती तो बेचारी हो जाती बेहाल
का गुजरती उस पर, का होता उसका हाल
कहीं थारी छोरी किसी छोरे सँग भाग तो नही गई
जो अभी तक सक्ल अपनी नही दिखाई
और कहीं अपने को कोई हूर परी समझत रहत हो
का कोई गलती तो नाहीं करत हो??
सुन ये शँभु चाचा सिर खुजाते बोले
बँद चुप्पी के ताले आखिर उन्होने भी खोले,
“छोरी का तो हूर होने का तो मारो पतो नहीं
किसी ने कभी कछु कहो नही
पर हाँ ,वो आपको लँगूर ज़रूर समझत है
और यही बात सच है
यही बात छोरी ने कही
और हमको इधर उधर घुमात करत बात आयो नही
छोरी ने थारे को खिड़की से घर में घुसत देख लियो
तब से छोरी ने अपने को कमरे में बँद कियो
वोअब कहत रहे” चाहे हमको चूल्हे में झोंक दयो
कुँऐ मे फेंक दयो ज़हर दे दयो
या कटार से मार दयो
पर मैं इस तिल्ली समान डेढ फुटिये लँगूर से ब्याह ना कर पाऊँ
चाहे ती उम्र भर घर में कुँवारी बैठ जाऊँ
छोरी को हमने तो बहुत समझायो
पर छोरी तो फाँसी लगा जान देने पर उतर आयो
अब ऐसे में मैं का कर जाऊँ
छोरी के साथ जोर जबर्दस्ती तो ना कर पाऊँ
एक इकलौती ही छोरी है मारी
वो ना माने तो कैसे सादी कर दूँ थारी
हमका तो तुम माफ कर दो
पर कोई गिला न रखना ,दिल हमरी ओर से साफ कर लो।”
कह कर ये शँभुजी ने तो साथ छटक लिया
पर सुन ये बेचारे पान्डुजी का तो दिल ऐसे टूट गया
मानो लुटरों ने खजाना उन का था कोई लूट लिया
रूँआसा बड़ी मुश्किल से आँसू अपने रोक पाया
बिन लड़की देखे ही तशरीफ का टोकरा उन्होने अपना उठाया
फिर दूसरी लड़की के घर की ओर दुखी मन रूख अपना कराया
खाया पिया कुछ नहीं और पैसा खर्चा बारहा आना
बेचारे पान्डुजी ने क्या कहना था लड़की ने ही कह दिया उन को ना ना…

द्वारा अनु सैनी

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