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वो अटल फैसला…a short story

motivational story

वो अटल फैसला…द्वारा अनु सैनी

“सुहाना,युसुफ को गिराना मत और अमीना और समीना का हाथ पकङ ध्यान से ट्रेन में चढ़ना। भीङ बहुत है। मैं कुली से सामान चढवाती हूँ “ट्र्रेन को प्लैटफार्म पर आते देख तीस वर्षीय बुरके पहने नजमा बोली,

“जी अम्मी, मैं ध्यान रख रही हु, आप बेफिक्र सामान चढवाए। और सुनो, समीना अमीना तुम मेरे साथ ही चढना, इधर उधर मत हो जाना।” सुहाना जो दो बरस के गोद लिए युसुफ को और कस के पकड़ा अमीना महीना को पीछे धकेलते जल्दी से बोली।

जैसे ही ट्रेन रुकी लोगों ने चढने के लिए धक्का मुक्की शुरू कर दी। जैसे तैसे कर नजमा अपनी बच्चियों समेत ऊपर चढ़ी और सामान टिका सब अपनी सीटों पर बैठ गए। थोङी बाद जब ट्रेन चलनी शुरू हुई तो अमीना बोली “अम्मी, हम लखनऊ जा रहे। नानू के पास बहुत मजे आऐगे”

नजमा बोली”हां, वही जा रहे”

इस पर समीना पूछ ऊठी” तो अब्बू हमारे साथ क्यों नही जा रहे। हम तो अब्बू के बिना पहले कभी नही गए”? नजमा ट्रेन से बाहर देखते बोली”नही, वो अपनी अम्मी के पास रह रहे, सिर्फ हम जा रहे।” “हम कब वापिस आएगें, स्कूल में छुट्टी भी नहीं। अब्बू बिना मुझे अच्छा नही लगता “समीना जो अब्बू की चहेती थी बोल उठी।

नजमा इस बात को सुन कुछ नही बोली और सिर्फ बाहर देखने लगी। तब सुहाना बोल उठी,”अमीना, समीना जब आना होगा आ जाऐंगे, अभी तुम युसुफ के साथ खेलो। अम्मी को त॔ग मत करो अम्मी को पता है ना चोट लगी है। बहुत दर्द में है।”

सुहाना जो अपनी उम्र से ज्यादा समझदार थी और बात भी वैसे ही करती थी। वैसे वो ज्यादा बङी नही थी, सिर्फ बारह बरस की थी, समीना सात और अमीना आठ बरस की। पर सब से बङी होने के कारण तीनों छोटे भाई बहन की जिम्मेदारी उस पर आन पङी थी। इतनी कम उम्र में वो तीन बच्चों को सम्भाल रही थी। अम्मी की मदद करने वाली वो अकेली थी। और कोई जो नही था। सारा दिन अम्मी काम करते थक जाती थी। सलीम की अम्मी को तो आस परोस वालों से ही फुरसत नहीं थी।

सलीम को बेटे की ख्वाइश और उस की अम्मी की जिद्द के आगे नजमा के तेरह वर्ष की शादी में चार बच्चे हो गए थे। नजमा केवल सत्रह बरस की थी जब उसका निकाह हो गया था। सलीम की अम्मी हर बार लङकी होने पर ये कह उठती कि अगर पोता ना दिया तो वो सलीम का दूसरा निकाह पढवा देगी और ये दूसरे निकाह की तलवार कहर बन नजमा पर चौब्बीसों घण्टे लटकती थी। डाक्टरनी के लाख मना करने पर भी नजमा बच्चा पैदा करती जा रही थी। कितनी कमजोर हो गई थी। पर ये बात ना ही सलीम ना उसकी अम्मी को समझ आ रही थी। युसुफ के हो जाने पर नजमा ने अल्लाह का लाख शुक्राना अदा किया था और फिर डाक्टरनी के समझाने पर बिना किसी को बताए नसबन्दी का ऑपरेशन करवा लिया था। उसे पता था कि घर में इस बात का गर पता चल गया तो कयामत ही आ जाएगी इसलिए अपने शौहर, सास यहाँ तक अपने पीहर वालों सब से छुपा कर ये बात रखी थी।

सलीम मियां बरेली में कशीदाकारी का काम करता था। महीने के आठ हजार के वेतन में ही गुजर करनी पडती थी। सबके और नजमा के बहुत जोर देने पर बच्चियों को बेमन से वो सरकारी स्कूल मैं पढने को भेज रहा था। नजमा घर का पूरा काम करती थी। और सुहाना स्कूल से आकर अपनी अम्मी का हाथ बँटाती। सलीम की अम्मी आए दिन किसी ना किसी बात पर सलीम को नजमा के विरूद्ध भङकाती रहती थी और घर में लङाई का माहौल छिङ जाता था। सलीम काफी गुस्से वाला था। बात बात पर नजमा पर वो हाथ उठा देता। बच्चियों को भी कभी कभी वो नही बख्शता था। बच्चों की वजह से नजमा सब कुछ सहती रहती थी। किसी से कुछ नही कहती थी। उसे पता था कि वो सलीम पर ही पुहरी तरह से आश्रित है। कहाँ जाएगी। यही उसका बसेरा था।

ऐसा नही था कि सलीम बच्चों से प्यार नही करता था। जिस दिन सलीम अच्छे मूड में होता तो बच्चों को जलेबी बताशे खिला देता और छुट्टी वाले दिन कभी कभी घुमाने भी ले जाता था। कभी कोई मेला लगता तो मालिक उस को सामान बेचने के लिए वहाँ स्टाल में भेज देता तो वो अम्मी नजमा और बच्चों को भी बुला लेता। झूला झूलते, गोला खाते,बच्चे खुश हो जाते। ईद पर सस्ती नई फ्रांक उन्हे दिलवा देता। नजमा, अम्मी को भी कभी चूङी तो कभी सस्ता सूट खरीदवा देता। और युसुफ को गुब्बारा, खिलौना। सबके चेहरे इतने में खिल जाते। इस तरह गुज़र बसर हो रही थी। इतने सालों में नजमा कभी अकेली अपने अब्बू के पास नहीं गई थी। एक या दो दिन के लिए सलीम डेढ दो साल में उसे और बच्चों को उसके अब्बू से मिलवाने के लिए ले जाता था पर आज नजमा अकेली बच्चों को लेकर लखनऊ जा रही थी। अब वो वही रहेगी उस ने तय कर लिया था। उसे पता था कि अब आगे की जिन्दगी आसान नही होगी।

उस के जीवन में बहुत सी मुश्किलें आने वाली थी। पर अब वो हिम्मत नही हार सकती थी। अब्बू की भी आर्थिक हालत ठीक नही थी। उनकी आमदन का ज़रिया कुछ नही था। जो था उन्होने अपनी तीनों बेटियों की शादी पर लगा दिया था। पर अब्बू के एक बहुत करीब दोस्त थे जिन्हे वो रहीम चाचा कहती थी, वो एक अपना बुटीक चला रहे थे। जब नजमा उनसे फोन पर बात करते करते रो पङी थी तब उन्होने नजमा को अपने बुटीक पर काम का ऑफर दे दिया था और बच्चियों को एक जानकार के स्कूल में दाखिला का आश्वासन भी दिला दिया था जिसे सुन नजमा ने ये इतना बङा फैसला ले लिया था किअब वो खुद अपने दम पर अपने बच्चों को पढाएगी और उनकी परवरिश करेगी। नजमा शुरू से ही सिलाई में बहुत माहिर थी। उसने शादी से पहले सिलाई कढाई का कोर्स जो किया था। घर में अपने और अपनी सास के सूट घर में ही सिलती थी और उन पर ऐसी कढाई करती थी कि आस पास के देखने वाले दंग रह जाते थे। अपने बच्चों के भी हर तरह के कपङे सी लेती थी। अब वो अपने इस हुनर को अपनी रोजी रोटी का ज़रिया बनाने जा रही थी। अब तक नजमा अपनी सास की हर कही सुनी, हर जुल्मो सितम सह रही थी।

पर दो दिन पहले जब उसकी सास ने सुहाना के लिए पडौस में रहने वाली बानो बेगम के सौदी अरब से आए हुए अमीर अधेङ उम्र के भाई से निकाह की बात करी तो ये सुनते ही मानो नजमा के दिल ने पल भर के लिए धङकना बँद था कर दिया। सलीम की अम्मी सलीम से ये कहने लगी कि वो मेहर में पाँच लाख रूपया देग और रहने के लिए उन को एक पकका मकान भी देगा, थोङा उम्र ज्यादा है तो क्या हुआ? आदमियों की उम्र थोङी ना देखी जाती। माल मत्था तो है ना, सुहाना बहुत खुश रहेगी उसके साथ" नजमा को इस बात से एकदम सेअपने शरीर में इक सिहरन सी महसूस हूई। उसे लगा कि उसका लहू जम गया। वो कदाचित अपनी बेटी के साथ ऐसा होता नही देख सकती। तभी क्रोध की एक चिंगारी उसमें भङकने लगी। इतने साल उसने जो कुछ ना कसा आज चीख कर वो कहने लगी “नही, ये मुझे मन्जूर नही। मैं अपनी बेटी के साथ किसी को ऐसा नही करने दूगी। मेरी बेटी बिकाउ नही है।” इस पर सलीम जो लालच में अन्धा हो अपनी अम्मी की बातों में आ गया था नजमा को समझाने लगा। जब वो बातों से नही मानी तब खूब मारा पीटा भी और कहा, “कि अगर तुम्हे इस घर में मेरे साथ रहना है तो तुम्हे हमारी बात माननी पडेगी वरना बच्चों को लेकर कही दफा हो जाओ मुझे परवा नही।”

नजमा को तब उस पल किसी मार किसी चीज का डर नही रहा। कल क्या होगा, कैसे होगा? उसे पता नही था पर उसने अपनी बेटी की खातिर अपने शौहर का घर छोडने का फैसला कर लिया था। और अब ये फैसला उसका अटल था…।

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