पान्डुजी जब रावण थे बने-Panduji series (6)

राम लीला के आयोजक पान्डुजी के शहर में थे आए,
रावण के किरदार के लिए जगह जगह इश्तियार थे लगाए,
बाकी किरदारों के लिए नए कलाकार तो उन्हें आसानी से थे मिल गए,
पर रावण के किरदार के लिए वो कोई अच्छा योग्य कलाकार अब तक ना ढूँढ थे पाए,
इसलिए इश्तियार थे लगाए,
हर शहर में आयोजक नए कलाकारों को मौका थे देते,
इससे उनको बहुत से फायदे थे होते,
एक तो रोल मिलने पर नए लोग अपना आभार जताने आते थे,
जिससे प्रायोजक बहुत सी वाहि वाहि पाते थे,
दूसरे अभिनय का मौका मिलने के लालच में नए कलाकार मुफ्त में ही काम कर जाते थे,
और आयोजक खूब पैसे बनाते थे
जेबें अपनी भर जाते थे
खैर,इन सब बातों से बेखबर जैसे ही पान्डुजी ने इश्तिहार था पढा
पान्डुजी के अन्दर का छिपा कलाकार छलाँग लगा बाहर आने को झूम पड़ा
सो, वो भी आॅडिशन देने के लिए बाकी कलाकारों के साथ कतार में खड़े हो गए
और बहुत इँतज़ार करने के बाद अपनी कला दिखाने का मौका पा गए
आयजकों ने पान्डुजी के अभिनय को सबसे अच्छा था पाया
इसलिए रावण का रोल उन को मिल गया
रोल मिलते ही पान्डुजी का बीस इँच का सीना खुशी से फूल आया
और फिर तो भचले वो इतराया इतराया
पर पान्डुजी के चुनाव करने पर प्रायोजकों को इक समस्या ने था सताया
हर शहर में रावण का किरदार निभाने वाला कलाकार हमेशा लम्बा चौड़ा भारी भरकम शरीर का होता था
इसलिए रावण की पोशाक उनके पास उसी नाप का था
और पान्डुजी तो दुबला पतला डेढ पसली का ही था
कहीं से रावण सा दिखता ना था
और प्रायोजक नई पोशाक बनवाना नही चाहते थे
पैसा अपना बचाना चाहते थे
सो बहुत सोच विचार करने के बाद इस समस्या का इक हल उन्होने पाया
पाँच छः तकियों को पान्डुजी के आगे पीछे लगाया
तभी पान्डुजी का तीले जैसा दुबला शरीर थोड़ा भर पाया
फिर कच्ची सिलाई और बहुत से बकसुओं की मदद से पोशाक को पान्डुजी के नाप का बना उन्हे पहनाया
और फिर राम लीला चालू हो आई
कलाकारों ने अपने अच्छे अभिनय से बहुत तारिफें जुटाई
पर पान्डुजी तो कमाल थे
अपने अभिनय में बेमिसाल थे
रावण के सँवाद बोल उसके रोल को चार चाँद थे उन्होने लगाए
कि जैसे ही वो मँच पर आते तो लोग कुर्सियों से उठ तालियाँ सीटियाँ थे बजाते
सब कुछ बहुत अच्छे से था चल रहा
लोगों के मन को प्रसन्न था कर रहा
राम लीला का अब आखिरी दिन था आ गया
दर्शकों में एक अलग उत्साह था छा गया
अब राम रावण से युद्ध करने वाले थे
दसमुखी रावण को मृत्यु शैय्या पर पहुँचाने वाले थे
मध्यान्तर का समय था
अगला सीन पान्डुजी का था
कि अचानक पान्डुजी को जोर से नम्बर दो था आ गया
आवेश में चार समोसे दो प्लेट छोले भठूरे जो थे खा गया
बहुत कोशिश करने के बाद भी जब पान्डुजी खुद को ना रोक पाए
तो झट शौचालय की ओर भाग गए
जल्दी जल्दी सब बकसुए ,तकिये तमचा दिए हटाए
और नम्बर दो करने को बैठ गए
करने के बाद अभी थोड़ा आराम थे पाए
कि बाहर से भाई गेन्दुमल जोर से चिल्लाए
“अरे पान्डु भईया, का करत हो, जल्दी बाहर आऐं
पर्दे सारे हैं हट गए
राम जी वानर सेना सँग मँच पर हैं पहुँच गए
सब बेसब्री से तुहार इन्तज़ार है कर रहे
और प्रायोजक महोदय गुस्से में लाल पीले हो घूमत रहे
काहे इतनी देर लगा रहे
क्यों लोगों को इतना सता रहे”
गेन्दुमल को ये कहते सुनते ही पान्डुजी झट घबरा गए
और जल्दी जल्दी धोई धोई कर गदा पकड़ मँच पर पहुँच गए
और जैसे ही पहुँचे ,इससे पहले कि वो मुँह खोलते
अपने सँवाद बोलते
कि लोग जोर जोर से चिल्लाने लगे
जूते चप्पलें उन पर पर बरसाने लगे
औरते चीखें मार आँखे बँद कर बाहर भाग गई
सारे आयोजको में झट से पर्दे बँद करने की होड़ लग गई
पान्डुजी को कुछ बात समझ ना आई
पर जैसे ही अपने नीचे उन्होने नज़र दौड़ाई
उनको लगा कि उनको मिरगी की बेहोशी थी छाई
हुआ ये कि मँच पर आने की जल्दी में वो तमचा पहनना भूल गए थे
और कच्छा तो कभी वो पहनते ही नही थे
फिर क्या था, उनके इस अश्लील आचरण के कारण सबने मिलकर की थी उनकी बहुत धुनाई
ना ही हुई पान्डुजी की कोई कमाई
जो रही सही इज़्ज़त थो वो भी गँवाई
और ज़माने भर में हो गई उनकी रूसवाई
सबने इस घटना को नमक मिर्च लगा खूब था फैलाया
पर पान्डुजी के निभाए गए रावण के अच्छे किरदार को कोई भी याद नहीं रख पाया
अन्यथा नादानी में की गई गलती ने बेचारे पान्डुजी को सूली पर था चढाया
कितने दिन बेचारा शरम के कारण घर से बाहर ही नही था निकल पाया..

द्वारा अनु सैनी


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