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खांसी इक बला | खेल किस्मत का

खांसी इक बला और खेल किस्मत का

खांसी इक बला…

ये कम्बख्त खांसी ऐसी लगी है कि जाती ही नहीं
कितनी दवाइयों कर ली पर वश में आती ही नहीँ
एक बार छिङ जाए तो यूं लगे मानो हम स्वतन्त्रता संग्राम की लङाई में जुट गए
जिसको खत्म होने में सौ साल थे लग गए
आस पास के लोग हमें यूं खांसता देख ज्ञानी ध्यानी बन गए
हर कोई इससे निजात पाने के अपने नुस्खे फरमा गए
कोई कहता “अदरक शहद का रस पी लो”
तो कोई कहता “काली मिर्च लौंग भुन चबा लो”
कोई भाप लेने की हिदायत देता
तो कोई आयुर्वेदिक दवाइयों के बेशुमार नाम गिना देता
हम भी हर किसी की बात सुन भी रहे
और फिर मान भी रहे
बङी शिद्द्त के साथ अपने पर आज़मा रहे
पर जाने क्यों फिर भी अब तक फर्क क्यों नहीँ पा रहे
ऐसे लगता है कि ये खांसी काली चुङैल की तरह हम से चिपक गई
प्यार हमारे में है पङ गई
रात को भी चैन से सोने नहीं देती
मीठे मीठे सपनों में खोने नही देती
अब इसे दूर करने के लिए क्या किसी ओझा के पास जाऐ
झाङे फूंक करवाऐं
या फिर रहने की जगह ही बदल आऐं
कोई तो मदद के लिए आए क्योंकि हम तो इस बला को समझ नही पाए…

द्वारा अनु सैनी

खेल किस्मत का…

किसी को नशा शराब का
तो कोई दिवाना शबाब का
पर कुछ होते ऐसे भी रात के परवाने
पागल मस्ताने
जो बन कर छैल छबीले
रोब रंगीले
झट हो जाते तैयार
कितने बेकरार
कैसिनों में जाने के लिए
किस्मत अपनी आज़माने के लिए
नींद उङाते
पूरी रात जुआ खेल जाते
नोटों से मालामाल
हाथों से जेबों से पैसे निकाल
या तो हो जाते हलाल
या कर देते कमाल
जिस दिन जीत कर आते
तो जश्न में पार्टी मनाते
और गर हार जाते
तो थोङा शोक मनाते
फिर सब भूल जाते
सुधर कहां पाते?
और अगले दिन बन ठन फिर वहीं पहुंच जाते
किस्मत का खेल बङी शिद्द्त से खेल जाते…

द्वारा अनु सैनी

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