और लोगों ने शुक्र मनाया - Panduji series (3)

पान्डुजी को जब से प्यार में मिली थी नाकामयाबी
इस गम को भुलाने के लिए बन गए वो पियकड़ शराबी
हर रात शराब के अड्डे से इक ठर्रे की बोतल ले आते
अंग्रेज़ी खरीद कर पीने के लिए इतना वेतन जो नहीं थे पाते
देसी शराब के खूब पैग पे पैग चढाते
और उस महिला को याद कर आँसू बहाते
और फिर आॅल इण्डिया रेडियो की तरह चालू हो जाते
और अपनी बेसुरी आवाज़ में भूले बिसरे शोक भरे युगल गीत सुनाते
पूरी रात इतनी जोर जोर से फटे ढोल की तरह गाते
कि खराँटे भरने वालों को भी पीछे छोड़ आते
गहरी नींद सोने वालों को भी नीँद से जगाते
और निद्राहीन वालों की तो नीद बिल्कुल नदारद कर जाते
सुन उनके कर्णखाऊ नगमों को कानों में सबके दर्द थे हो आए

बचने के लिए जिसको रूई कपड़ा जो मिला, सबने कानों पर कवर की तरह थे चढाये

पर लाख कोशिशो के बाद भी ज्यादा फर्क ना हो पाए
क्योंकि जैसे जैसे शराब अन्दर जाए
पान्डुजी के सुर और ऊँचे हो जाए

छोटे बच्चों के लिए तो पान्डुजी शोले के गब्बर सिंह थे बन गए
कि डर के मारे बच्चे रो रो कर माँओं की जानों पर बन गए

सब पड़ौसी खूब चिल्लाये
माँ बहन की गाली दे आए
झगड़ा किए यहाँ तक लाते घूँसे भी टिकाए
पर पान्डुजी फिर भी नही रूक पाए
सब ने उनको डाँट प्यार से खूब समझाया

पर आखिर जब उन पर कोई असर होता हुआ नज़र नही आया
तब हार कर मालिक ने उनको जेल में डालने का खौफ दिखाया
नौकरी से निकाल दूँगा कह कर धमकाया
तब कहीं जाकर पान्डुजी के पल्ले कुछ पड़ पाया
अपने आप ही सारी आशिकी का भूत जैसे चढा था उतर आया
और आखिर शराब से छुटकारा मिल पाया
इस तरह गाना उनका बँद हो पाया
मत पूछो कि लोगों ने कितना शुक्र मनाया…

द्वारा अनु सैनी


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