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एक शहीद सिपाही | इम्तिहान की घङी

एक शहीद सिपाही

एक शहीद सिपाही…

तो था सरहद का इकआम सा बेनाम सिपाही
पहरा देता बंदूक थामा गुमनाम राही
जानता ना था वो कि जब तिरंगा में लिपटा घर को आएगा
तो इतनी शोहरत ऐसी पाएगा
कि हर कोई उसका नाम जान जाएगा
तब दूर दूर से लोगों की भीङ इकट्ठी हो जाएगी
कहीं दिवारों तो कहीं छतों पर चढी पाएगी
इक झलक पा लेने के लिए लोग कितने आतुर होंगे
अपनी जगह पर खङे खङे उचक रहे होंगे
ज़ोर ज़ोर से भारत माता की जय के नारे लग रहे होंगे
तो कहीं बैण्ड बाजा नगाङे बज रहे होंगे
फूलों की वर्षा हो रही होगी
पर इन सब में मानो घरवालों की क्या मनोदशा होगी?
मुश्किल से अपने आप को संभाले होंगे
ना थमने वाले बहते नीरों को बार बार पौंछ डाले होंगे
बच्चों की आंखों में कई सवाल उठ रहें होंगे
किस को पापा कह कर बुलाऐंगे किस से फरमाइशे कर जाऐंगे
अब किस के घर आने का इन्तज़ार कर आएंगे
अपनी शहादत पर वो नाम वाला तो हो जाएगा
पर इक संसार तो नहस तहस हो जाएगा…

द्वारा अनु सैनी

इम्तिहान की घङी…

जिन्दगी कभी कभी इन्सान को इक ऐसे मोङ पर लाकर खङा कर देती है
कि क्या करूं, कहां जाऊं,समझ पर उसकी कशमकश की धुंधली परत चढा देती है चारों ओर से मुसीबतों के पहाङ उस पर टूटने लगता है
तब इन्सान अपने को बहुत बेबस पाता है
और यदि ऊपर से अपने भी साथ छोङ दे
और उसे अकेला कर दे
वो उस इन्सान के इम्तिहान की सबसे बङी घङी होती है
कहर बङी जो उसके ऊपर गिरी होती है
ऐसे में या तो वो हिम्मत ना हार किसी तरह उन से जूझ लङता है
और आगे बढता है
वरना डरके और घबरा के ऐसी घनघोर उदासीनता की ओर अग्रसर हो लेता है
मनोबल कमजोर हो जाता है
कि कभी कभी वो आत्महत्या तक का रूख अपना लेता है
इस बेमिसाल अनमोल जिन्दगी से हाथ धो बैठता है
यही बन जाती समय की मार है
उस इन्सान की सबसे बङी हार है…

द्वारा अनु सैनी

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