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वो दौर अलग ही था | वो नवाबी अंदाज़

वो दौर अलग ही था और वो नवाबी अंदाज़

वो दौर अलग ही था…

वो छोटी सी मुलाकातें
घण्टों टेलिफोन पर बातें
बहुत कुछ हम थे कहतें
और तुम कम कहे सब थे सुनते तुम्हें मिलने की चाह में दिनों को बेसब्री से गिनती
साथ में चिट्ठियों का सिलसिला चालू रखती
जहां हाले दिल अपना बयान कर जाती
और फिर जवाब में तुम्हारी चिट्ठी के इन्तजार में गेट पर नज़रे गङी रहती
घङी की आहिस्ता चलती सुईयों से बहुत थी चिढती
और फिर डाकिए को आता देख दिल में इक हलचल सी मच जाती
झट दौङ कर चिट्ठी मैं ले आती
कमरे में जा पढने लग जाती
और जिस दिन तुम्हारी चिट्ठी नहीं थी आती
मायूसी सी दिल में थी छा जाती
हर चिट्ठी तुम्हारी कितनी बार मैं थी पढ़ती
वो जो कभी रूमानी प्यार भरी
तो कभी शिकायतों से होती जुङी
पर जाने क्यों एक ही तरह की चिट्ठी मुझे हर बार अलग ही दिखती
बङे संभाल कर हर चिट्ठी इक छोटे से बक्से में थी रखती
और हर चिट्ठी का जवाब जरूर देती पढाई खत्म करने के बाद देर रात बैठ थी लिखती
अपने मन की छोटी बङी बात
अपने उमङते जज़्बात
कालेज में की शरारतें
आसपास घटी वारदातें
कभी कुछ चित्रकारी भी कर जाती दिल के चिन्ह बना “आई लव यू” कह जाती
शादी के बाद भी कई सालों तक ये सिलसिला चलता रहा
गुफतगु का ये बेहतरीन ज़रिया फलता रहा
दूर रहते हुए भी तुम मुझे पास होते थे
घर आने की आस बंधते थे
फिर धीरे धीरे वो चिट्ठियों के सिलसिले बंद हो गए
मोबाइल फोन जो आ गए
अब चाहे बातें तो हैं हो जाती
पर वो सुन कर हवा में कही गुल हो जाती
उन चिट्ठियों की तरह अंकित ना हो पाती
यादें अनगिनत वैसे ना जुङ पाती
वो चिट्ठियों के दौर कुछ और थे
और आज मोबाइल के कुछ और से…

द्वारा अनु सैनी

वो नवाबी अंदाज़…

चेहरे पर मेकअप लगा कर
काला चश्मा आंखों पर चढा कर
निकली थी रिक्शा पर बैठ कर
थोङी तनी तनी सी ऐंठ कर
नवाबों के शहर में मैं घूमने निकली
बनी ठनी रंगीली तितली
बाजारों की सङकें नाप रही
सजी धजी दुकानें ताक रही
पुतलों पर चढी ड्रेसें निहार रही
मुझ पर कितनी जचेंगी कल्पना की पतंगे उङा रही
कि तभी रिक्शे वाले की टक्कर हो आई
और दूसरे रिक्शे पर बैठे जैल छबीले नवाब से अखियां मेरी चार हो आई
देख मुझ सी थोङी मोटी पर हसीन सैक्सी कुङी
मन में नवाबजी के जली पहली नज़र जैसे हुए प्रेम की फुलझङी
मुझे देखते ही वो तो मानो शाहरूख खान हो गए
अधेङ उम्र के थे पर तब जवान हो गए
खींच कर आंख मुझे ऐसी मारी
कि लाल मैं ऐसे हो आई जैसे आशिकी पुरानी हो हमारी
ये देख लगा उन्हें की लङकी सस्ते में पट गई
बेचारे नवाब की तो अक्ल कहीं सटक गई
झट से एक सांस में”आई लव यू” बोल गए
पर तभी उस पल पैदल चलते हमारे पति देव वहा पहुंच गए खींच के लगाया नवाब जी को ऐसा लप्पङ
कि बेचारे नवाब जी को तो आया जोर दार चक्कर
सारी दिल्लगी झट से घुम्मकङ हो गई
आशिकी छू मंतर हो गई
इससे पहले दूसरा खाते”आई एम सारी “कह वो नवाबजी तो दुमदुमा कर जल्दी से भाग गए
पर सच कहूं मेरे मन में खुशी के लड्डु भर गए
मुझे इस उम्र में किसी ने तो आंख मारी
उस नवाबी अंदाज़ ने जवानी याद दिला दी सारी…

द्वारा अनु सैनी

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