बच्चों के चहेते चाचू पान्डुजी-Panduji series(7)

पान्डुजी अब तक थे कुँवारे
बाकी उन की उम्र के शादी शुदा सब दोस्त हो गए थे सारे
कितनों के तो रोते बिलखते ,स्कूल जाते न्याने भी हो गए थे
जो देख कर पान्डुजी को खुशी से चीखते चिल्लाते
उन के पीठ कन्धों पर बन्दर समान चढ जाते
कभी सिर उनका तबला समझ बजाते
कभी छटँकी भर बाल उनके पूट जाते
कभी लँगूर की तरह उन्हें खरौंचते जाते
तो कभी उन की पीठ पर सवार घोड़े की तरह उन्हें भगाते
कोई पजामा उनका खींच चाकलेट टाफी की माँग कर जाता
तो कोई अँगुली पकड़ बाहर घुमाने के लिए ज़िद पकड़ आता
कोई उनसे कहानी सुनने के लिए अड़ जाता
तो कोई नई गेम के लिए ज़मीन पर पसर जाता
माँऐं भी अपने बच्चे पान्डुजी के पास छोड़ इधर उधर खिसक जाती
आखिर कुछ समय के लिए ही सही इन शोर मचाते बच्चों से तो छुटकारा पाती
दोस्त भी इत्मिनान से कुर्सी पर जम के बैठ जाते
और हँस कर बच्चों से कह देते,
“लो, अब तुहार चाचा आए गए हैं
जाओ देखो, तुहार खातिर का लाए है
अब हमरा सिर खाना छोड़ो
जाओ अपने चाचाजी को पकड़ो
आज हमको ऑफिस में बहुत काम था
मिला नहीं दो घड़ी भी आराम का
तनिक हम भी चा पी सुसता लें
तुहार अम्मा से थोड़ा बतिया ले”
ये सुन बच्चे लपक कर पान्डुजी की ओर दौड़ आते
और बेचारे डेढ पसली के पान्डुजी इन उतों के आगे कुछ ना कर पाते
और उनकी हर माँग पूरी कर जात
उनके हर महीने यूँही पाँच छः सो रूपये इन बच्चों पर खर्च हो जाते
फिर पूरा महीना चाहे खुद तँगी में बिताते
क्योंकि पान्डुजी बहुत भावुक कोमल हृदयी थे
बच्चों के प्रति स्नेह रखते थे
इसलिए भावनाओं में बह कर रह जाते
और क्यों नहीं ,आखिर बच्चे भी तो उनको प्यार से चाचू चाचू कह कर के जो थे बुलाते…

द्वारा अनु सैनी


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